वैदिक विज्ञान में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति

जिस प्रकार वायु मंडल के एक बिंदु पर गर्मी के कारण वायु हल्की होके ऊपर उठती है, ठीक उसी प्रकार परमात्मा तत्व में एक बिंदु पर विकोचन होता है और वह स्थान घनत्व की दृष्टि से हल्का हो जाता है। चक्रवात की ही भाँती चारो और से इस परमात्मा (मूल्तत्व) की धाराएं उस खाली स्थान को भरने के लिए उस और दौड़ती हैं और वहां एक घूमता हुआ शंक्वाकार भंवर बन जाता है, जिसे वाममार्गी प्रथम ‘महायोनि’ की उत्पत्ति कहते हैं। इस पर इसके घूमने के कारण आवेश उत्पन्न होता है।

इस नन्ही ‘महायोनि’ के उत्पन्न होते ही परमात्मा रुपी तेज तत्व में इसके शीर्ष की और प्रतिक्रिया होती है और एक विपरीत प्रकृति का शंक्वाकार भंवर बन जाता है, जिस पर विपरीत आवेश (अपोजिट चार्ज) होता है। इसे वाममार्ग में ‘शिवलिंग’ की उत्पत्ति कहा जाता है।

विपरीत आवेश (चार्ज) के कारण  ये दोनों भंवर एक दुसरे की ओर खिंचते हैं और एक दुसरे में समा जाते हैं। इनके सामने से पहले का शीर्ष बिंदु दुसरे के पेंदे के मध्य टकराता है और दुसरे का शीर्ष बिंदु पहले के पेंदे के बीच और इसके केंद्र में दोनों का दाब (प्रेशर) पड़ता है।

इससे इस नन्हे परमाणु में तीन उर्जा उत्सर्जन बिंदु बनते हैं, जिनसे घन और ऋण आवेश (पॉजिटिव और नेगेटिव चार्ज) की क्रिया से उर्जा उत्सर्जन (एनर्जी रेडिएशन) होता है। इसे ही प्राचीन ऋषियों ने ‘पृथ्वी’, ‘सूर्य’ और ‘आकाश’ का जन्म बताया है।

इस प्रकार प्रकाश से लाखों गुना सूक्ष्म एक नन्हे परमाणु का जन्म होता है। जिसमें तीन पॉवर पॉइंट होते हैं। एक घन (+) उर्जा का उत्सर्जन करने वाला बिंदु, दूसरा ऋण (-) उर्जा का उत्सर्जन करने वाला बिंदु, तीसरा नाभिक (nucleus)।

इसे वैदिक ऋषियों ने ‘त्रिगुणी’ महामाया कहा है। वाममार्गी साधक इसे शिव का डमरू कहते हैं।

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति ‘परमात्मा रुपी’ अनंत विस्तार में होती है। इसकी उत्पत्ति और संरचना चक्रवात-जैसी होती है। अंतर केवल इतना होता है की वायु एक भौतिक पदार्थ है, इसलिए चक्रवात में सर्किट नहीं बनता, पर परमात्मा एक तेजमय तत्वा है, इसलिए उसमे धाराओं के घूर्णन एवं एक-दुसरे के काटने से पॉवर सर्किट बन जाता है। यह पॉवर सर्किट ही अपना विस्तार करते हुए, अपने अन्दर नए-नए सर्किटो को बनाते हुआ विशाल ब्रह्माण्ड के रूप में परिवर्तित हो जाता है।

वैदिक ऋषियों ने कहा है कि परमात्मा तत्व में पहले एक क्रिया होती है, फिर उसकी प्रतिक्रिया होती है, फिर उनसे क्रिया-प्रतिक्रिया की एक अनंत श्रंखला प्रारम्भ हो जाती है और इस ब्रह्माण्ड का बीजरूप वामनावतार एक अतिशूक्ष्म परमाणु उत्पन्न होता है। यह ‘परमाणु’ ही प्रथम ‘आत्मा’ विष्णु का स्वरुप है, जो अपने अन्दर ‘पृथ्वी’, ‘आकाश’ और सूर्य को लिए हुए उत्पन्न होता है और अपनी शक्ति से ‘मूलतत्व’ (परमात्मा) को खींच-खींचकर अपना विस्तार करते हुए इस ब्रह्माण्ड की अद्भुत लीला को उत्पन्न करता है।

यह सब रूपकों में कहा गया है और चूंकि पृथ्वी, आकाश, सूर्य आदि शब्दों का अर्थ हम आधुनिक युग के अर्थ के अनुसार लगाते हैं, इसलिए प्राचीन विवरण हमें फैंटम कथाओं-जैसे लगने लगते हैं। वास्तव में, यहाँ ‘पृथ्वी’ का अर्थ  आधार बिंदु (नेगेटिव पॉइंट), आकाश का अर्थ आगम बिंदु (पॉजिटिव पॉइंट) और सूर्य का अर्थ नाभिक है। 

प्रेम कुमार शर्मा

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